कोरोनावायरस ,लॉकडाउन और बेरोजगारी

कोरोनावायरस और लॉकडाउन से तो जनता परेशान है ही लेकिन सबसे ज़्यादा परेशान इस बात से है कि सभी की नौकरी और बिज़नेस ठप पड़े है | लॉकडाउन के कारण दिन पर दिन बेरोजगारी बढ़ती जा रहीं है लोगों के पास नौकरी है बड़ी से बड़ी कंपनी बंद हो गई है ऐसे में ये सवाल उठता है कि कितने प्रतिशत बेरोजगारी बड़ी है भारत को लेकर अनुमान है कि संपूर्ण लॉकडाउन में पहली बार ढील देने की अवधि 20 अप्रैल से 3 मई में देश के 170 जिलों में सिर्फ 57 फीसदी आर्थिक गतिविधियां चालू हो पाई हैं और इसी कारण देश में जो लोग दूसरा काम करते है 55 फीसदी यानी 14.3 करोड़ लोगों के पास रोजगार नहीं रहा। वहीँ  सरकार ने 4 मई से भी लॉकडाउन में ढील ही है, लेकिन रोजगार के मोर्चे पर ज्यादा असर नहीं हुआ है। अभी भी 10.7 करोड़ लोग घर पर बैठे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, यदि आने वाले दिनों में रेलवे, हवाई उड़ानें, शॉपिंग मॉल और सिनेमा हॉल समेत मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियों को छोड़कर अन्य सभी की अनुमति दी जाए तब भी करोड़ों लोग बेरोजगार ही रहेंगे। एक तरह से देखा जाए तो कोविड-19 ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर उस समय हमला किया है, जब यह पहले से ही लड़खड़ाई हुई थी. जब एक तरफ निवेश का नामोनिशान गायब था, बेरोजगारी दर काफी ऊंची थी और ग्रामीण मजदूरी और उपभोग में लगभग ठहराव आ गया था.इसलिए जब सरकार कोविड-19 से मुकाबला करने के लिए आर्थिक गतिविधियों पर ताला लगाएगी, तब उसे यह मालूम होगा कि इससे और बेरोजगारी पैदा होगी और लोगों की कमाई में और गिरावट आएगी.प्रधानमंत्री मोदी की यह सलाह देना काफी नहीं है कि वे अपने कर्मचारियों को नौकरी से ना निकाले या छटनी ना करें.बड़ी कंपनियां अगले तीन से छह महीने तक भारी घाटा झेल सकती हैं. लेकिन छोटे ओर सूक्ष्म उद्यमों के लिए ऐसा करना शायद मुमकिन न हो.इसलिए भारत देश बेरोजगारी से बचने के लिए कुछ तो उपाय ढूंढ़ना ही होगा ताकि ग्रामीण और शहरी क्षेत्र दोनों अपनी ज़िन्दगी अच्छे से गुज़ार सके क्यों कि अगले 6 महीने तक कंपनियों के पास रोजगार और आय नहीं है |
This article is written By: Vagisha Pandey(Indore)

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